संक्षिप्त विवरण
तंजावुर के 11 वीं शताब्दी के बृहदीश्वर मंदिर में 11 वीं और 12 वीं शताब्दी के दो और मंदिर जुड़ चुके हैं, ये 1987 में हुई खुदाई में प्राप्त हुए हैं. ये मंदिर चोल साम्राज्य के राजाओं द्वारा बनवाए गए थे, यह साम्राज्य दक्षिण भारत और निकट के द्वीपों तक फैला था. इस स्थान पर 11 वीं और 12 वीं शताब्दी के तीन भव्य चोल मंदिर है: तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, गांगेयकोंडाचोलिस्वरम मंदिर और दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर. गांगेयकोंडाचोलिस्वरम मंदिर राजेंद्र प्रथम द्वारा बनवाया गया और 1035 में पूरा हुआ. इसका 53 मीटर का विमान (शिखर) के कोने, तंजावुर के सीधे शिखर के विपरीत, सुंदरता से ऊपर की ओर घूमे हुए हैं. इस मंदिर में द्वारपालों की मूर्तियाँ के छ: युग्म हैं जो विशाल एक ही चट्टान से बने हैं और अंदर की ओर कांसे की सुंदर प्रतिमा है. ऐरावतेश्वर मंदिर दारासुरम में राजेंद्र द्वितीय द्वारा बनवाया गया था, इसका 24 मीटर का विमान है और एक शिव की प्रस्तर प्रतिमा है. ये मंदिर चोलों की स्थापत्य, शिल्प, चित्रकला और कांसे की ढलाई की उपलब्धियों के साक्षी हैं.
अभिलेख की प्रामाणिकता
मापदंड (i): दक्षिणी भारत के तीन चोल मंदिर, मंदिरों की विशुद्ध द्रविड़ शैली की स्थापत्य अवधारणा में उत्कृष्ट सृजनात्मक उपलब्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं.
मापदंड (ii): तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर पहला विशाल चोल मंदिर बना, इसके बाद विकास के क्रम में दो मंदिर और बने.
मापदंड (iii): तीन भव्य चोल मंदिर दक्षिण भारत में चोल साम्राज्य और तमिल सभ्यता के स्थापत्य के विकास के असाधारण और सबसे उत्कृष्ट प्रमाण हैं.
मापदंड (iv): तंजावुर, गागेयकोंडाचोलापुरम और दारासुरम के भव्य चोल मंदिर, चोल विचारधारा के स्थापत्य और प्रतिनिधित्व के विशिष्ट उदाहरण हैं.
टिप्पणी
वैश्विक धरोहर में सूचीबद्ध, खुदाई में पहले प्राप्त "बृहदीश्वर मंदिर, तंजावुर", "भव्य चोल मंदिर" का एक भाग हैं.
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